आज उसका पुरूषत्व जाग उठा

पुरूषत्व बनाम दहेज

राकेश अपने फ्लेट की घण्टी बजाना ही चाह रहा था कि अन्दर की फुसफुसाहट सुनकर रूक गया। खिड़की के पास जाकर ध्यान से सुनने लगा। अपरिचित स्वर `डार्लिग मेरा तो दिल धड़क रहा है, कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन कोई देख ले और तुम्हारे पति से कह दे। ऐसे प्रतिदिन मेरा आना ठीक नहीं है।´
`मैं कितनी बार कह चुकी हूँ विजय। राकेश बेचारा बड़ा सीधा है। उसको इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उसका पुरूषत्व मेरे पिता द्वारा दिये गये दहेज से दब गया है । कहने की तो क्या वह स्वयं देख भी ले तो भी न बोले।´ मंजू ने लापरवाही के साथ जबाब दिया।
राकेश के लिये और सुन पाना सम्भव नहीं था उसके हाथ स्वत: ही घन्टी पर पड़ गये, आज उसका पुरूषत्व जाग उठा।

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अब तो कभी नहीं छुपोगे ?

अदालत

अदालत कोर्ट कचहरी आदि से कौन परिचित न होगा ? किन्तु वकीलों, न्यायाधीशों व अदालती कर्मचारियों को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो अदालत जाना पसन्द करे। अदालत विभिन्न प्रकार की होतीं हैं- तहसील की अदालत, जिला अदालत से लेकर उच्चतम न्यायालय तक अदालतों की एक बहुत बड़ी श्रंृखला पाई जाती है। इनके अतिरिक्त आजकल अन्य वििशश्ट अदालतों का गठन भी होने लगा है, जैसे-उपभोक्ता अदालत,पारिवारिक अदालत तथा इसी तरह की अन्य अनेक विशिष्ट अदालतें। किन्तु मेरा इन अदालतों से कोई प्रयोजन नहीं, मैं उस अदालत की बात कर रहा हूँ जिसमें किसी वकील या पेशकार की आवश्यकता नहीं पड़ती।
जी,हाँ! मैं उस अदालत की बात कर रहा हूँ जिसमें बिना बहस के सत्य की परतें उघड़ती चली जाती हैं। जिसमें किसी गवाह की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिसकी कार्यवाही के लिए किसी प्रक्रिया व निर्धारित कार्यक्रम की आवश्यकता नहीं पड़ती।जहाँ अभियुक्त की भूमिका में भी मैं ही हुआ करता था तो अपराध को स्वीकार कर गवाह-सबूत का कार्य भी मैं ही पूरा कर दिया करता था। वकील या सिफारिशी की भूमिका आवश्यक होने पर मेरी माताजी पूरी करती थीं। उस अदालत में कभी किसी भी प्रकार की सजा नहीं दी जाती,क्षमा करके गोदी में ले लेना ही वहाँ का अन्तिम निर्णय होता था, होता था क्यों ? होता है। आप बता सकते हैं ? मैं किस अदालत की बात कर रहा हूँ ।
जी ,हाँ!आप सही पहुँचे। मैं पिताजी की अदालत की ही बात कर रहा हूँ। बचपन में, पिताजी की अदालत में, एक बार मेरी पेशी हुई। पिताजी की अदालत से मुझे इतना डर लगता था कि अगर मैं कोई अपराध कर बैठता और माताजी पिताजी के पास ले जातीं तो उनसे निवेदन करता आप कितना भी दण्ड दें लें किन्तु पिताजी के पास न ले जाये। एक बार की घटना तो मुझे अभी तक ऐसी याद है जैसे, पिताजी सामने खड़े हैं और मैं अपराधी जमीन में गढ़ा जा रहा हूँ।
एक दिन सुबह-सुबह मैं कॉलेज जाने के लिये घर से निकला, पर कॉलेज नहीं गया क्योंकि विज्ञान के गुरुजी ने जो काम दिया था, उसे मैं पूरा नहीं कर पाया था। विज्ञान के गुरुजी बड़े तेज मिजाज के थे। उनके द्वारा लगाई जाने वाली पिटाई से कक्षा के सभी छात्र घबड़ाते थे। मेरा भोजन किसी न किसी माध्यम से कॉलेज भेज दिया जाता था। मैं कालेज तो गया ही नहीं था तथा यह डर भी बना हुआ था कि भोजन के समय मेरा कॉलेज में न मिलना पिताजी को पता चल गया तो क्या हालात होगी ? मेरे गाँव से कालेज लगभग दो किलोमीटर दूर थी। बीच में एक बम्बा (नाला) पड़ता था। नाले पर से जो मुख्य रास्ता था वहीं पर मूँज में छिपकर मैं बैठ गया और भोजन लाने वाले की प्रतीक्षा करने लगा।
काफी दूर से ही मैंने भोजन लाने वाले को देख लिया। अब समस्या थी कि इनसे भोजन लेने सामने कैसे जाँऊ? ठीक समय पर मस्तिष्क ने काम किया, मैंने बस्ते को वहीं छिपाया, चुपके से निकल दौड़ता हुआ अपने घर की ओर चलने लगा। रास्ते में भोजन लाते हुए भोजन लाने वाले को तो मिलना ही था, वे बोले यहाँ क्यों आय? उत्तर दिया भाई जी भूख लग रही थी सोचा घर पर जाकर ही भोजन कर आऊँ और टिफिन लेकर उन्हें लौटाकर वापस अपने छुपे हुये स्थान पर आया तथा भोजन कर बैठा रहा । छुट्टी की घण्टी सुनकर घर पहुँचा।
दुर्भाग्य से मेरी करतूतों का पता घर पर लग चुका था। कोई सज्जन मुझे छिपा हुआ देख आये थे और उन्होंने हमारे घर सबकुछ बता दिया था। मैं घर पहुँचा ही था कि माताजी के द्वारा मुझे पिताजी के पास जाने का निर्देश मिला। मुझे पता नहीं था,फिर भी चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत। मैं डरता-डरता पिताजी के पास पहुँचा। पिताजी ने बड़ी ही शान्ति से पूछा कहाँ से आ रहे हो? मैंने जबाब दिया, `कॉलेज` से। इसके बाद पिताजी ने आदेश दिया- कॉलेज में क्या-क्या पढ़ाया? बस्ता लाकर हमें दिखाओ। मैं जीवन की एक कठिन समस्या से जूझ रहा था। मुँह से अपने आप निकल पड़ा, कालेज में आज कोई भी पीरियेड नहीं लगा।
मुझे यह नहीं पता था कि मैं काँप भी रहा हूँ। पिताजी की आँखे गुस्से से लाल हो रहीं थी। मेरे एक तमाचा लगाते हुए बोले सच-सच बताओ। अब मेरा धैर्य टूट चुका था मैंने रोते-रोते सबकुछ बता दिया।
अदालत बन्द हो चुकी थी। मैं पाँच दिन तक बहुत परेशान रहा क्योंकि पिताजी ने मुझसे बोलना बन्द कर दिया था। यह मेरे लिये सबसे बड़ी सजा थी। अब मुझे प्रतीक्षा थी पिताजी के सामने जाने की। आखिर छठवें दिन उन्होंने मुझे बुलाया और पूछा- अब तो कभी नहीं छुपोगे ? मैंने कहा अब कभी नहीं !

सन्तोषी सदा सुखी

सन्तोषी सदा सुखी

एक मुकुन्दपुर नाम का एक गाँव था। गाँव के पास ही एक कच्ची सड़क थी वह सड़क ही मुख्यत: वहाँ से आने जाने का एक साधन थी। उसी गाव में राधा नाम की एक औरत रहती थी, बेचारी के एक बेटा था। वह दिन भर कड़ा परिश्रम करती तब जाकर खाने पीने की व्यवस्था कर पाती। खाने-पीने के बाद धन बचाकर बच्चे की पढ़ाई में लगा देती। इसी प्रकार मेहनत करके उसने अपने बेटे को हाईस्कूल करा दिया था। उसके बेटे का नाम था रमेश। रमेश भी पढ़ने में मेहनती था अत: वह चाहती थी कि उसका बेटा खूब पढ़े और एक बड़ा आदमी बने।रमेश को पढ़ाने के लिये राधा ने और अधिक काम करना प्रारम्भ किया और जैसे तैसे रमेश को पढ़ने के लिये शहर भेज दिया। रमेश शहर में जाकर कालेज में पढ़ने लगा। उसकी माँ महीने के महीने पैसे भेज देती। इसी प्रकार रमेश ने बी.ए. किया और एक दिन उसकी नौकरी भी लग गयी।राधा को जब यह पता लगा रमेश की नौकरी लग गयी है उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। अब उसके सपने पूरे होने का समय जो आया था। वह सोच रही थी कि अपने बेटे की धूमधाम से शादी करेगी। घर में एक बहू आयेगी तो उसे भी कुछ आराम मिलेगा।
राधा एक दिन बैठी पड़ोसिन से बातें कर रही थी कि उसका बेटा कितना अच्छा है? नौकरी लग गयी है———आदि। उसी समय डाकिया ने उसको एक पत्र दिया जो रमेश का ही था उसमें लिखा था, “माँ मैनें अपने साथ की एक खूबसूरत लड़की से शादी कर ली है।´´ तुम इस बारे में न सोचना। पत्र पढ़ते-2 बेचारी राधा का तो दिल ही टूट गया। बुढ्डी हो गयी जिसकी आशा में उसके भी यही हाल। अब तो बेचारी राधा काम करने लायक भी नहीं रही। क्या करेगी वह। वह कई दिन तक अपने घर में बैठी-2 रोती रहती कई दिन तो घर से बाहर भी न निकली। उसके चार-पाँच दिन तो बीत गये बिना कुछ खाये पीये।
एक दिन एक साधू भिक्षा माँगते-2 आया तो उसने बुढ्ढी को रोते हुये देखा। साधू ने राधा से पूछा कि वह क्यों रो रही है तो उसने उसे सारा दुख कह सुनाया। साधू ने कहा, “धीरज रखो रोने से क्या होगा,´´ सन्तोश रखो सन्तोशी सदैव सुखी रहता है। यह कहकर वह चला गया। साधू के चले जाने पर वह गाँव से बाहर सड़क के किनारे झोंपड़ी में रहने लगी। वह वहाँ से गुजरने वालों को पानी पिलाती। कुछ समय बाद वह स्थान ही प्याऊ के नाम से मशहूर हो गयी। उसे सभी प्याऊ वाली अम्मा कहकर पुकारते वह उसे वहीं खाना दे जाते। वह अब सुखी थी चिन्ता मुक्त थी। वह सभी से कहती बेटा “सन्तोषी सदा सुखी
´´

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हमने परिक्रमा की मर्यादा को बनाये रखा….

मर्यादा

मैं अक्सर यही सोचता रहता हूँ कि आजकल के लड़के लड़कियों का जो व्यवहार है,उसे चारत्रिक पतन कहूँ या आधुनिकता! कभी-कभी सोचने लगता हूँ कि यह वक्त का फेर ही है, ऐसा ही होता है उस आयु में। कभी-कभी सोचता हूँ यह विकृत शहरी संस्कृति का परिणाम है,गाँवों में तो ऐसा संभव ही नहीं। हाँ, शहरों में किशोर व युवा वय के विद्यार्थियों के जीवन में ऐसी घटनाएँ घटित होना आम बात ही है।
उस समय मैं महाविद्यालय का छात्र था। घर में चाची जी से कभी भी पटती न थी। चाचा जी बहुत प्यार करते थे,प्यार तो चाची जी भी कम न करतीं थीं किन्तु न जाने क्यों ? उनका स्वभाव ही कुछ ऐसा था कि कभी भी मुझे अच्छा न लगा। उनके सामने कभी भी मैं अपनी बात खुलकर कह ही नहीं पाता था। घर में यदि घर की मालकिन से ही बना के न रखा जा सके तो उस घर में सुकून से कैसे रहा जा सकता है? अत: परेशान होकर,पिताजी ने किराये पर कमरा लेकर अलग रहने की व्यवस्था कर दी थी। आखिर पढ़ना तो था ही,और गाँव में उच्च अध्ययन की व्यवस्था नहीं थी। कितनी परेशानी होती थी,भोजन बनाने में,झाड़ू लगाने में बर्तन साफ करने में, किन्तु फिर भी प्रसन्न रहता था। स्वतंत्रता जो थी। चाची जी की व्यर्थ की टोका-टाकी से तो मुक्ति मिली।
शहरी जीवन मेरे लिए बिल्कुल नया था। एक नया उत्साह था,स्वतंत्रता का नया आनन्द था किन्तु फिर भी परेशान। मैं अभी तक कभी भी अकेला नहीं रहा था। एकांकीपन जैसे खाने को दौड़ता था। यहाँ तो एकदम अकेला पड़ गया था। कोई परिचित भी न था। प्रथम वर्ष थी अभी कालेज भी रास नहीं आ रहा था। किसी से बात करने में भी डर लगता था,दोस्ती करने की तो बात ही बहुत दूर की कोड़ी थी। इस अपरिचित माहोल में किसी से बात करने का साहस न होता किन्तु अकेला रहना तो उससे भी अधिक मुिश्कल था। अपरिचित माहौल में किसी को परिचित बनाने की ललक थी। प्रबल इच्छा थी कि न केवल परिचित बल्कि एक दोस्त हो,एक हमराज हो जिससे खुलकर बात कर सकँू। जिसके साथ बैठकर घड़ी भर को लगे कि कोई अपना भी है।
सुबह-सुबह का समय था। मैं प्रात:काल उठने में लेट हो गया था। अत: कालेज जाने की तैयारी हड़बड़ी में की क्योंकि सुबह सात बजे से क्लास लगतीं थी। आज मुझे देरी हो गई थी अत: मैं अपने मकान के दरवाजे से लगभग दौड़ने जैसी हालात में बाहर निकला। जल्दी का काम शैतान का,मैं आमे देख ही नहीं पाया था कि अकस्मात किसी से जा टकराया।
मैं घबड़ा गया। वह गिर पड़ी थी। मुझे अपनी लापरवाही का अहसास हुआ,लेकिन अब क्या हो सकता था। मैंने डरते हुए उसे कहा,`सॉरी मैं कुछ जल्दी में था अत: देख नहीं पाया।´ वह जबाब मैं केवल मुस्करा दी,मैं आश्वस्त हुआ अन्यथा डर लग रहा था,लड़की है न जाने क्या बखेड़ा खड़ा कर दे। मुझे कॉलेज जाने की जल्दी थी अत: उससे छुटकारा पाकर रिक्शे पर जाने की इच्छा से सामने देखा ही था कि सामने ही रिक्शा दिखाई दिया। मैं रिक्शे पर बेठ गया तथा रिक्शे वाले से कॉलेज चलने के लिए कहा। रिक्शे वाला चलता उससे पहले ही वह भी आकर उसी रिक्शे पर बैठ गई तथा रिक्शे वाले से बोली, `मुझे भी उधर ही जाना है,जल्दी से चलो´। दुर्भाग्य कहूं या सौभाग्य उसका कालेज भी उसी दिशा में रास्ते ही मैं पड़ता था। मैं कर भी क्या सकता था,एक तरफ सिकुड़ कर बैठ गया। मैं पहले ही एक गलती कर चुका था,अब ऐसी किसी हरकत से बचना चाहता था जिससे वह मुझे बदतमीज समझे।
`क्या नाम है आपका?´ उसकी सुरीली आवाज मेरे कानों में पड़ी। मेरे लिए उसका प्रश्न अनपेक्षित था अत: उसके प्रश्न से चौंका! जैसे-तैसे उत्तर दिया, `आलोक´। उसके बाद तो प्रश्नों की झड़ी ही लग गई, क्या करते हो? कौन सी क्लास में पड़ते हो ? कौन-कौन से सब्जेक्ट हैं? कहाँ रहते हो? मेरी इच्छा हो रही थी कि उससे कह दूँ कि आपको क्या मतलब? किन्तु मेरी हिम्मत नहीं पड़ी और जैसे-तैसे उसके प्रश्नों के जबाब देता गया।
अब तक मैं सामान्य हो चुका था। अब मेरी बारी थी। मैंने पूछा,आपका नाम?
नीतू, उसने मुस्करा कर जबाब दिया। इतना छोटा व प्यारा नाम है आपका। मेरे मुँह से अकस्मात निकल गया।
`वैसे मेरा पूरा नाम नीता भारद्वाज है,घर में प्यार से नीतू कहते हैं´ उसने स्पश्ट किया। तब तक उसका कालेज आ गया था। वह रिक्शे से उतर कर चली गई।
उस दिन अक्षय नवमी थी। मथुरा की पंच-कोसी परिक्रमा लग रही थी। मैंने भी सोचा,खाली बैठे क्या करें आज परिक्रमा ही लगा ली जाय। और मैं बिना अधिक सोच-विचार किये चल पड़ा परिक्रमा लगाने। मैं अकेला तो था ही अपने ही चिन्तन में लीन चला जा रहा था कि तभी मुझे लगा कि कोई मुझे पीछे से पुकार रहा है। मैंने पीछे मुड़कर देखा तो दौड़कर आती हुई नीतू दिखाई दी। उसकी साँसो की गति से लग रहा था कि वर काफी देर से दौड़ रही है।
`कितनी देर से पुकार रही हूं मैं आपको। आप हैं कि बस दौड़ते चले जा रहें हैं जिससे आस-पास कोई और है ही नहीं।´ उसने पास आते हुए उलाहने भरे स्वर में कहा।
`नहीं,दौड़ तो नहीं रहा, आपकी आवाज ही सुनाई नहीं दी´ मैंने झेंपते हुए कहा।
`आप अकेली हैं क्या?´ मैंने प्रतिप्रश्न किया।
`नहीं तो, अकेली कहाँ हूँ,इतने सारे लोग जो हैं और आप भी तो साथ हैं। हाँ,लगता है आप अवश्य अकेले हैं जो इतने लोंगो के बीच में चलते हुए भी बगल वाले का नहीं पता कि बगल में कोई है भी कि नहीं´ उसने दा्र्शनिक अन्दाज में कहा।
नीतू सुन्दर तो थी ही। हँसमुख स्वभाव उसकी सुन्दरता में चार चाँद लगा रहा था। वह जितना खुलकर बात कर रही थी मैं स्वयं भी आश्चर्यचकित था। ऐसा लगता था कि जैसे हम वर्षों से एक दूसरे के साथ रह रहें हों। वह बातों पर बातें किए जा रही थी। मैं उसकी बातों में साथ नहीं दे पा रहा था। केवल हाँ या नहीं कहकर काम चला रहा था। मैं उसी के बारे में सोच रहा था, कैसी लड़की है,`जान न पहचान कूद पड़ा शैतान´।
`आप जूस पियेंगे?´ अचानक उसने पूछा।
`नहीं,मेरी इच्छा नहीं है। आप की इच्छा हो तो पी लें।´ मैंने औपचारिकता पूरी करते हुए कहा।
`इच्छा नहीं है तो न सही। बिना इच्छा के ही पी लो, जरूरी थोड़े ही है कि प्रत्येक कार्य अपनी इच्छा से ही किया जाय। कभी-कभी दूसरों की इच्छा के अनुसार भी चलना चाहिए, और फिर मैं अकेली थोड़े ही पी सकती हूँ। चाहिए तो यह था कि आप स्वयं मुझे आग्रहपूर्वक जूस पिलाते,आखिर एक लड़की आपके साथ चल रही है और आप हैं कि उसे एक गिलास जूस के लिए ऑफर नहीं कर सकते। ऑफर करना तो दूर की बात उसके ऑफर को भी ठुकराने के लिए तैयार बैठे हैं। कैसे लड़के हैं आप? अब एक शब्द भी नहीं सुनूँगी चुपचाप मेरे साथ दुकान पर आओ।´आदेश देती हुई जूस की दुकान की ओर मुड़ गई। मेरे पास उसका अनुकरण करने के सिवा कोई चारा न था।
जूस पीते-पीते उसकी दृष्टि परिक्रमा मार्ग के किनारे पत्थर के टुकड़ों से बनाई गई छोटी-छोटी आकृतियों की ओर गया। जिनको इकट्ठा करके एक घर की रूपरेखा बनाने की कोिशश की गई थी। मेरा ध्यान उस ओर आकर्शित करके उसने पूछा,`यह क्या है? क्या तुम जानते हो?´
मैंने इन्कार करते हुए सिर हिला दिया,`नहीं तो।´
उसने बिना मेरे प्रति-प्रश्न के स्वयं ही बताना प्रारंभ कर दिया,`यह परिक्रमार्थियों द्वारा बनाये गये घर हैं, ऐसी धारणा है कि परिक्रमा मार्ग में जो इस तरह घर बनाता है। वास्तविक जीवन में उसका घर बन जाता है अर्थात उसका घर बस जाता है।´
मेरे मुँह से अनायास ही निकला, `सच?´
`यह तो नहीं जानती´ उसका जबाब था।
मैंने प्रश्न किया,`तुमने घर बनाया?´
`अभी तो नहीं´ उसने शरमाते हुए जबाब दिया।
`चलो, हम दोंनो भी एक-एक घर बनाते हैं।´ मैंने ऐसे ही मनोविनोद में कहा।
`एक-एक नहीं,एक घर बनाते हैं।´ उसने मुस्कराते हुए कहा और खड़ी हो गई। हम दोंनो थोड़ी दूर तक आगे चले फिर परिक्रमा के रास्ते से एक किनारे हटकर पेड़ो के झुरमुट में जाकर बैठ गये। अब मैं और वह दोंनो के सिवा वहाँ कोई नहीं था। वह बिल्कुल मुझ से सटकर बैठी थी,उसका हाथ मेरी कमर में था। मैं नि:संकोच उसकी काली-काली अलकों में उगँली घुमा रहा था। ऐसे ही जाने कितना समय निकल गया था, पता ही नहीं चला। उसने अपनी दोनों संगमरमरी बाहें मेरे गले में डाल दी थीं। मैंने उसे सीने से लगा लिया था। `मुझे तो संपूर्ण परिक्रमा का पुण्य मिल गया´ उसने चुंबन लेते हुए कहा।
परिक्रमा, परिक्रमा का नाम सुनकर मैं चेतनावस्था में आया। मैं तो परिक्रमा को बिल्कुल भूल ही गया था। अचानक मैंने उसे आलिंगन से अलग करते हुए प्यार से कहा,`घर नहीं बनाओगी,चलो काफी देर हो गई है। अभी परिक्रमा में भी काफी समय लगेगा। और परिक्रमा में यह सब ठीक नहीं।´
मैं खड़ा हो चुका था। वह भी अनमनयस्क सी खड़ी हो गई और अपने कपड़े सभाँलती हुई,कुछ रूठी हुई सी चल दी। हाँ,घर बनाने के लिए,न मैंने उससे कहा तथा न ही उसने और शेश परिक्रमा हमने सामान्य बातें करते हुए पूरी की परिक्रमा के बाद उससे भेंट ही नहीं हुई। मैं आज भी संतुश्ट हूँ कि उस दिन कम से कम हमने परिक्रमा की मर्यादा को बनाये रखा।

उनका हिस्सा भी उसी दिन शायंकाल उनके आवास पर भिजवा दिया

लोकतांत्रिक ईमानदारी

विद्यालय में नवागन्तुक प्राचार्य जी को कार्यभार ग्रहण किये हुए अभी बामुश्किल तीन माह ही हुए थे। वातावरण में एक नवीनता का आभास था। कर्मचारियों तथा छात्र-छात्राओं के मस्तिष्क में एक जिज्ञासा का भाव था क्योंकि अभी तक कोई भी उनकी कार्यपद्धति को नहीं समझ पाया था। उन्होंने कर्मचारियों से एक प्रकार की दूरी बनाए रखी थी। अत: कोई भी उन्हें समझ नहीं पा रहा था। युवा कर्मचारियों को उनसे विद्यालय के विकास की आशा थी तो पुराने वालों का अनुभव बोलता था कि अभी देखते जाइये पक्का घाघ है। लूटकर खायेगा तथा हवा भी नहीं लगने देगा। प्राचार्य अल्पभाशी,मधुर-भाशी व आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। विद्यालय के अधिकांश कर्मचारियों तथा छात्र-छात्राओं में उनके प्रति सहयोग किये जाने की भावना थी क्योंकि पहली बार उनकी जाति के प्राचार्य आये थे।
उनके आने के बाद यह पहली स्टाफ मीटिंग थी क्योंकि अभी तक स्टाफ मीटिंग न बुलाकर एक प्रकार से वहाँ के वातावरण को ही समझने का प्रयत्न उन्होंने किया था। मीटिंग तीन घण्टे तक चली। उन्होंने सभी कर्मचारियों के साथ बड़े प्रेम से व्यवहार किया तथा बैठक बड़े ही सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में संपन्न हुई। उन्होंने कहा,`मैं प्रशासन में पूर्ण लोकतंत्र का हिमायती हूँ। आप लोग नि:सकोच होकर स्पष्ट रूप से समस्याएँ मेरे सामने रखें तथा उसका समाधान सुझायें कि क्या किया जा सकता है? न केवल आपकी बात सुनी जायेगी,बल्कि आपको कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता दी जायेगी।´
मीटिंग से निकलते हुए सभी कर्मचारी प्राचार्य जी की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। एक सृजनात्मक वातावरण का सृजन हो रहा था। मिस्टर गुप्ता स्टॉफ रूम में आकर बैठे ही थे कि विद्यालय का एक लिपिक आया, उसने गुप्ता जी के सामने एक बिल रख दिया। गुप्ता जी को बड़ा आश्चर्य हुआ। विद्यालय में 25000 रुपये का सामान खरीदा गया था। किन्तु बिना भौतिक सत्यापन के वे उस पर हस्ताक्षर कैसे करते। बिल पर भुगतान किया जाय की सील लगी थी तथा प्राचार्य जी द्वारा उसे पास कर दिया गया था। गुप्ता जी धर्म-संकट में फँस गये प्राचार्य जी के पास किये जाने के बाद वे बिल को कैसे रोकें? सामान कहाँ आया?…..कैसा आया?…..उन्हें कुछ पता नहीं, वे कैसे हस्ताक्षर कर दें। उन्हें अब वे सभी सुनी-सुनाई बातें याद आने लगी जिन पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया था,जो उन्हें प्रतिदिन सुनने को मिलती थी कि किस प्रकार मैस में से दूध व अन्य राशन सामग्री गायब हो रही थी तथा किस प्रकार पूर्तिकर्ता प्राचार्य जी के मित्र बनते जा रहे थे। गुप्ता जी ने बिल पर हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया। लिपिक ने पुन: धमकी भरे अंदाज में विनती की सोच लीजिए गुप्ता जी प्राचार्य जी के हस्ताक्षर के बाद बिल को रोका जाना ठीक नहीं है। जब गुप्ता जी ने हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया तो लिपिक महोदय प्राचार्य कक्ष में चले गये।
गुप्ता जी को विचारमग्न अवस्था में अभी पाँच मिनट भी नहीं हुए थे कि स्टॉफ रूम में चतुर्थ-श्रेणी कर्मचारी ने प्रवेश किया और बताया कि आपको प्राचार्य जी ने याद किया है। गुप्ता जी समझ गये कि उनकी पेशी है। गुप्ता जी प्राचार्य कक्ष में गये उस समय उनका मूड़ उखड़ा हुआ था। प्राचार्य जी ने गुप्ता जी का स्वागत उसी चिर-परिचित मुस्कान के साथ किया किन्तु आज गुप्ता जी को उसकी कृत्रिमता का आभास स्पष्ट हो रहा था जिसे वे आज तक महसूस नहीं कर पाये थे। प्राचार्य जी ने बड़ी मधुर भाषा गुप्ताजी को समझाया, मैं प्राचार्य हूँ इस विद्यालय का, जब मैने बिल को पास कर दिया तो आपको आपत्ति नहीं होनी चाहिए गुप्ता जी। मैंने हस्ताक्षर कर दिये तो आप इन्कार कैसे कर सकते हैं? विद्यालय मुझे चलाना है आप सहयोग कीजिए वरना मुझे उप-निदेशक महोदय से बात करनी होगी। आप प्राचार्य के द्वारा हस्ताक्षरित बिल पर हस्ताक्षर करने से मना करके चेयर की अवहेलना कर रहे हैं। आपकी ए.सी.आर. खराब हो सकती है। आप वरिष्ठ अध्यापक हैं आपको प्रशासनिक नियमों का पता होना चाहिए। आपकी जानकारी के लिए आपको बता दूँ। प्रशासन के क्षेत्र में दो नियम लागू होते है़-
Rule 1:–Boss is always right.
Rule 2:-If there is any confusion, see rule number 1.

गुप्ता जी की अगले वर्ष ही पदोन्नति होने वाली थी। बड़ी आसानी से समझ गये। अत: उन्होंने बिना ना-नूकुर के हस्ताक्षर किये और प्राचार्य कक्ष से बाहर आ गये। प्राचार्य जी बड़े ही ईमानदार आदमी थे तभी तो उन्होंने गुप्ता जी को माफ कर दिया तथा उनका हिस्सा भी उसी दिन शायंकाल उनके आवास पर भिजवा दिया।

काश! काली नदी पर न आता

काली नदी

भानपुर एक छोटा सा गाँव था, वह काली नदी के किनारे स्थित था। भानपुर में मछुए लोग रहते थे। गाँव से कुछ दूर एक तालाब भी था। मछुओं का एकमात्र काम मछली पकड़ना था। मछलियों से ही उनकी जीविका चलती थी। भानपुर के मछुए बड़े परेशान थे, क्योंकि गाँव के बाहर जो काली नदी थी, उस पर परियों का अधिकार था वहाँ कोई भी मछुआ मछली पकड़ने नहीं जा सकता था। परियों का डर बना रहता था कि अगर हम काली नदी में मछली पकड़ने गये तो परियां हमें बर्बाद कर देगीं।
भानपुर में ही एक कालू नाम का मछुआ रहता था। उसके परिवार में उसकी एक सुन्दर पत्नी व एक बच्चा था। कालू बड़ा अहंकारी था, उसे अपनी पत्नी की सुन्दरता एवं अपनी ताकत पर घमण्ड था तथा वह काली नदी में ही मछली पकड़ने जाता। वह अपनी पत्नी को हर समय साथ रखता था किन्तु काली नदी पर नहीं ले जाता था।
एक दिन परियों ने मिलकर कालू को सबक सिखाने का निश्चय किया तथा एक बड़ा मगरमच्छ जादू का बनाकर काली नदी में छोड़ दिया। शांय को जब कालू लौट रहा था तो मगरमच्छ ने नाव रोक दी और कालू की तरफ मुँह फाड़कर खाने को लपका, कालू ने अपना भाला उठाया किन्तु मगरमच्छ के विशाल शरीर को देख हक्का बक्का हो गया उसका भाला ऊपर उठा का उठा रह गया। आज कालू सोच रहा था कि मैं काली नदी पर न आता तो अच्छा रहता।