यूज एण्ड थ्रो

यूज एण्ड थ्रो

उसके हाथ में, उसकी आधुनिक प्रेमिका उमा का पत्र था, हां, उसी उमा का, जिसके पत्र को पाकर वह फूला नहीं समाता था, जिसकी आवाज को टेलीफोन पर सुनकर उसका अंग-अंग बोलने लगाता था। आज उसी के पत्र को पाकर जैसे उसके प्राण ही निकल गये थे।
वह पत्र को हाथ में लिए हुए ही, स्मृतियों में खो गया। उसे याद आने लगे उसके वे पत्र जिनमें वह लिखती थी, `मैंने, तुम्हें देर से सही, किन्तु सोच-समझकर स्वीकार किया है। मैं केवल तुम्हारी हूं और किसी की तरफ देखने की तो क्या चलती है, सोच भी नहीं सकती और भी न जाने क्या-क्या?…….. वह उस पत्र में ही डूब गया। उसके बाद उसे वह पत्र याद आया, जिसमें लिखा था, “न मालुम मुझमें क्या बात है( लोग मेरी और आकर्षित क्यों होते हैं?) मैं जहां भी जाती हूं, वहीं आकर्षण का केन्द्र बन जाती हूं। मुझसे सभी बात करना चाहते हैं और मुझे सहयोग देते हैं।´´
वह स्मृतियों में डूबा हुआ भी मुस्करा पड़ा, `ठीक ही तो लिखा था। उसी आकर्षण के बंधन में तो मैं आज भी बंधा हुआ हूं।´ उसके बाद वह उस पत्र की स्मृतियों में खो गया जिसमें उसने लिखा था, `तुम मुझे चैलेंज मत करना। मैंने आज तक जिस व्यक्ति और वस्तु को चाहा है, उसे प्रयोग करके फेंक दिया है।´
वह विचार मग्न हो गया। सही ही तो लिखा था, उसने मुझे भी उसने अपनी इच्छानुसार भोगा और जब मन भर गया लिख दिया, “मैं इस प्रेम-व्रेम के रोग को नहीं पालती,प्रेम एक बकवास शब्द है। मुझे तुमसे कोई लेना-देना नहीं। मैं तुमसे अब मिलना भी नहीं चाहती। मुझे शान्ति से जीने दो। मेरा पीछा छोड़ो।´´
वह उन विषाद के क्षणों में भी मुस्करा पड़ा, `मुझे तो इसी में सन्तुष्टि है, कुछ क्षणों, कुछ पलों या कुछ दिनों के लिए ही सही, तुमने मुझे चाहा तो! तुम्हारा दोष ही क्या है?’ यह जमाना ही `यूज एण्ड थ्रो´ का है।´ विचार करते हुए वह पुन: उसी पत्र को पढ़ने लगा।