ईमानदारी की विचित्र व नई परिभाषा

ईमानदार?
ईमान जब से अपने कार्यालय में वरिष्ठतम् कर्मचारी बना था। कार्यालय का वातावरण ही बदला हुआ सा प्रतीत होता था। ईमानदारी से कार्य करने की उसकी आदत के कारण संस्थान के आपूर्तिकर्ता ही नहीं, उसके बॉस भी उससे परेशान थे।
ईमान संस्थान में आने वाली प्रत्येक आपूर्ति की मात्रा व गुणवत्ता की जांच टेण्डर में दी गई ‘शर्तो व सेम्पल के अनुसार करता था। कई बार निम्न गुणवत्ता होने के कारण सामान वापस भी किया था। कम मात्रा में सामान आने के कारण बिल में काट-पीट होना तो सामान्य बात थी। आपूर्तिकर्ता ईमान से झगड़ते व विभिन्न प्रकार की धमकियां देते। बॉस भी संकेतों से कई बार ईमान को कह चुके थे कि वह आपूर्तिकर्ताओं को परेशान न किया करे। ईमान समझ ही न पाता था कि जब हम अच्छी गुणवत्ता का पूरा भुगतान कर रहे हैं तो सामान को जांच-परख कर लेने में क्या बुराई है?
एक दिन ईमान के बॉस ने उसे अपने चेम्बर में बुलाया और बुरी तरह डांटने लगे, “तुम अपने आपको ज्यादा ईमानदार समझते हो? तुम्हारे सिवा संस्थान के सारे कर्मचारी बेईमान हैं क्या? तुम ईमानदारी का मतलब भी समझते हो? तुम्हारी दृष्टि में मैं बेईमान हूं? ईमानदारी का मतलब आर्थिक मामलों में ईमानदारी से ही नहीं होता। दो पैसे लेने से आदमी बेईमान नहीं हो जाता। मैं अपने परिवार के लिए पूरी तरह से ईमानदार हूं। अपनी बीबी व बच्चों की सारी जरूरतें पूरी करता हूं। भले ही इसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े। अपने घर में अपनी बीबी-बच्चों को तो खुश रख नहीं सकते। ईमानदारी के पीछे लठ लिए फिरते हो। ईमानदारी किसे कहते हैं? समझते भी हो?´´
बॉस की ईमानदारी की विचित्र व नई परिभाषा सुनकर ईमान हक्का-बक्का रह गया।