दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम

मित्रो! दहेज को लेकर विद्यालयों में अध्ययन के दौरान बड़ा ही भयावना 

चित्र प्रस्तुत किया जाता है। यही नहीं सामाजिक संस्थाओं द्वारा, पत्र-

पत्रिकाओं द्वारा बड़ें ही भावपूर्ण ढंग से दहेज के विरोध में अनेक प्रकार से

 भाषण/आलेख प्रस्तुत किए जाते हैं। किंतु व्यवहार में दहेज के बिना कोई

 विवाह नहीं देखा जाता। परंपरा के नाम पर लड़के व लड़के वालों को किस 

तरह दहेज लेने के लिए मजबूर किया जाता है, बिना दहेज शादी होने पर  

महिला की गलतियों को छिपाने के लिए किस प्रकार दहेज एक्ट के तहत 

झूठे मुकदमे दर्ज कराकर लड़के व लड़के के परिवार वालों को किस प्रकार 

प्रताड़ित किया जाता है। इस प्रकार के समाचार आये दिन पत्र-पत्रिकाओं 

में छपते रहते हैं। इसी पृष्ठभूमि पर आधारित एक लम्बी कहानी 

धारावाहिक रूप में यहाँ प्रस्तुत की जा रही है-

“दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम”

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कहां है होडल का गौरव वर्षा?

गौरव

लगभग तेरह वर्ष पूर्व में होडल (फरीदाबाद) के एक स्कूल में वाणिज्य-प्रवक्ता के रूप में पढ़ाया करता था। कभी-कभी खाली कालांश में हैडमास्टर साहब दसवीं कक्षा में हिन्दी के कालांश में भेज दिया करते थे। उस कक्षा में एक दिन मैंने बच्चों को समझाया कि यदि कोई छात्र सीखना चाहता है तो वह अवश्य ही सीख लेगा, भले ही अध्यापक सिखाने से इन्कार करे। विद्यार्थी को चाहिए कि वह अध्यापक के पीछे पड़ जाय। अन्तत: उसे सफलता मिलेगी ही।
लगभग एक माह बाद जब पुन: मुझे उस कक्षा में जाने का अवसर मिला तो पिछली बार कक्षा में मैंने क्या बातचीत कीं थीं मैं भूल चुका था। मैंने पाठयक्रम का कोई बिन्दु लेकर चर्चा की। उसी कक्षा में एक छात्रा थी वशाZ। वह कक्षा की ही नहीं पूरे विद्यालय का गौरव थी। जब मैंने अपनी चर्चा का समापन किया तो वशाZ ने खड़े होकर एक प्रश्न किया। घंटी बज चुकी थी। मैंने यह कहते हुए कि अब यह प्रश्न अपने विशयाध्यापक से पूछना, मैंने कक्षा में और समय देने से इन्कार कर दिया व कक्षा से बाहर आ गया। जब मैं अगला कालांश लेने कक्षा 12 की तरफ जा रहा था, मुझे मालुम हुआ वशाZ मेरे पीछे चली आ रही है। मैंने उसे डाँटने के अन्दाज में पूछा, `क्या बात है वशाZ?´
वह बड़ी ही ‘ाालीनता से बोली, `मुझे अपने प्रश्न का उत्तर चाहिए सर, जब तक आप सन्तुश्ट नहीं करेंगे, मैं आपके पीछे ही चलती रहूँगी भले ही मुझे आपके घर पर जाना पड़े।´ फिर वह कुछ रूकी और बोली, `सर, पिछली बार आपने ही तो कहा था कि यदि किसी से कुछ ज्ञान प्राप्त करना हो तो उसके पीछे पड़ जाओ, जब तक उस ज्ञान को प्राप्त न कर लो।´ मैं उस छात्रा की प्रत्युत्पन्नमति को देखकर हैरान रह गया, कौन ऐसा शिक्षक होगा जो ऐसी छात्रा को पढ़ाकर गौरव की अनुभूति न करे। मुझे अगला कालांश कक्षा 12 में वाणिज्य का पढ़ाने से पूर्व उसे उसकी समस्या का समाधान सुझाना पड़ा।

पापी कौन ?

पापी कौन ?
एक बार एक इलाके में सूखा पड़ गया। राजाओं का शासन था, आज-कल की तरह खाद्यान्नो के भण्डार भी नहीं रखे जाते थे। जनता पूर्णत: राजा इन्द्र पर ही निर्भर रहा करती थी। सूखा को देखते हुए लोग चिन्तित होने लगे। राजा भी चिन्तित था। स्थान-स्थान पर वर्षा के लिए यज्ञ किए जाने लगे। बहुत से धर्माचार्य तपस्या करने लगे ताकि इन्द्र खुश होकर वर्षा करे व चारों तरफ खुशहाली आये।
धर्माचार्यो की तपस्या व यज्ञों के प्रभाव से वर्षा होने लगी, किन्तु यह क्या लोग वर्षा से भी परेशान हो गए क्योंकि वर्षा बन्द होने का नाम ही नहीं ले रही थी। मूसलाधार वारिश हो रही थी, स्थिति गंभीर थी। इधर कुँआ उधर खाई वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। सभी परेशान थे, इसी इलाके में धर्माचार्यो का भी एक छोटा-सा गाँव था जो पूरा पानी से घिरा था। गाँव के सभी लोग दुखी थे। गाँव में पंचायत आहूत की गई, जिसमें सभी ने विचार व्यक्त किए कि हमारे बीच अवश्य ही कोई पापी है, जिसके पापों की सजा हम सभी को भुगतनी पड़ रही है, क्यों न ऐसे पापी को ढ़ूढ़ निकाला जाए; अत: सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास हुआ कि गाँव के बाहर जो हनूमान का मन्दिर है, प्रत्येक आदमी उसके दर्शन करने जाय, जो पापी होगा वह वापस न आ सकेगा।
एक-एक करके सभी लोग मिन्दर जाने व आने लगे। उनके बीच में एक ऐसा व्यक्ति भी था जो बीमार था व चलने-फिरने में असमर्थ था( उसने मिन्दर जाने में असमर्थता व्यक्त की, फिर क्या था सभी एक स्वर से चिल्लाने लगे, `अवश्य ही यह पापी होगा´। मजबूरन उस बिचारे को भी लाठी लेकर मिन्दर की तरफ जाना पड़ा। वह गाँव से निकला ही था कि तभी गाँव पर बिजली पड़ी व सम्पूर्ण गाँव नश्ट हो गया। केवल वह अकेला जीवित था व हतप्रभ होकर गाँव की तरफ देख रहा था।