समानता का नारा कहीं पुरूष वर्ग का षड्यंत्र तो नहीं

षड्यंत्र
शालू बड़े लाड़-प्यार में पली थी। उसके पिताजी लड़के और लड़कियों में कोई अंतर नहीं समझते थे। अत: सभी भाई-बहनों के खान-पान, पहनने-ओढ़ने व शिक्षा-दीक्षा में कोई अंतर नहीं किया था। शालू के पिताजी महिला-पुरूष समानता के पक्षधर जो थे। शालू भी भाइयों के साथ पढ़ने-लिखने व खेलने-कूदने में प्रसन्नता का अनुभव करती।
लेकिन उसे उस समय बड़ा बुरा लगता, जब शालू की माँ, शालू को रसोई के काम सिखाती व बात-बात पर डाँट देती। शालू को ओर भी बुरा लगता, जब शालू की माँ कहती,“ससुराल में जाकर मेरी नाक कटायेगी, तेरी सास कहा करेगी कि तेरी माँ ने तुझे क्या सिखाया है?
शालू जब कालेज में पढ़ने जाने लगी, उसे स्त्री-पुरूष समानता पर चर्चा सुनने को मिलतीं। यही नहीं, अध्ययन में `नारी अधिकार´ उसका प्रिय विषय था। एक बार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित सेमीनार में `महिला-पुरूष समानता´ पर भाषण दिया तो विश्वविद्यालय की ओर से शालू को सर्वश्रेष्ठ वक्ता के रूप में पुरूस्कृत किया गया। शालू ने स्नातकोत्तर में प्रथम श्रेणी प्राप्त की, जबकि उसके भाई द्वितीय श्रेणी ही ला सके थे। शालू के पिता को अपनी बेटी पर गर्व था।
पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद शालू की शालू एक श्रेष्ठ परिवार में कर दी गई। शालू के परिवार में सभी पढ़े-लिखे व समझदार थे। शालू के ससुर ने साफ कह दिया था कि हम महिला-पुरूष में कोई भेद नहीं करते, यदि शालू चाहे तो नौकरी भी कर सकती है। शालू को गर्व था, ऐसे परिवार की बहू होने पर।
शालू ने प्रसन्नता के साथ नौकरी ज्वाइन कर ली। शालू व उसके पति, दोनों नौकरी पर जाते। शालू सुबह चाय बनाती, सास-ससुर की सेवा करती, ऑफिस की तैयारी करती, अपना व अपने पति का लंच बॉक्स लगाती व दोनों अपने-अपने काम पर चले जाते। कुछ समय तो सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा, किंतु जब शालू गर्भवती हुई, उसका ऑफिस जाने का मन न करता। प्रसव के बाद तो उसकी परेशानी और भी बढ़ गईं। वह घर व बच्चे को सभॉले या ऑफिस? उसे मजबूरी में सभी कार्य करने पड़ते। बच्चे को आया के भरोसे छोड़ना वह बिल्कुल पसन्द न करती। उसके पति सहयोगी प्रकृति के आदमी थे, पूरा सहयोग करते किन्तु उसके कामों को तो उसे ही करना होगा। आज शालू को लगता, स्त्री-पुरूष दोनों समान नहीं हैं, इन्हें प्रकृति ने ही भिन्न-भिन्न बनाया है। ये दोनों एक-दूसरे के सहयोगी व पूरक हैं और इसे स्वीकार करके ही प्रसन्न रह सकते हैं।
अगले ही क्षण शालू के मस्तिष्क में प्रश्न उठता, समानता का नारा कहीं पुरुष वर्ग का शड्यंत्र तो नहीं ताकि वे अपने उत्तरदायित्वों को भी महिलाओं पर डाल सके?
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गांधी का चेला

गांधी का चेला

लगभग तीन वर्ष पूर्व की बात है। दिसम्बर या जनवरी की ठण्डी रात्रि थी। रात्रि के आठ बज रहे थे। मैं कोसी (मथुरा) बाईपास पर खड़ा, बस की प्रतीक्षा कर रहा था। मुझे होडल जाना था, जहाँ मैं प्राइवेट स्कूल में अध्यापन कार्य करता था। काफी प्रतीक्षा के बाद राजस्थान परिवहन निगम की एक बस आयी। मैं परिचालक को पूछकर बस में बैठ गया। बस लगभग एक किलोमीटर आगे आई होगी। परिचालक मेरे पास आया, मैंने उसे टिकट के लिए रूपये दिये किन्तु यह क्या? वह तो बिना टिकट दिये ही आगे बढ़ गया। मैंने सोचा शायद वापस आकर टिकट देगा। किंतु जब वह काफी देर तक वापस लौटकर नहीं आया तो मैंने उसके पास वापस जाकर टिकट माँगी। उसने कहा, `चुपचाप गाड़ी में बैठ जा, टिकट का क्या करेगा?´ मैंने उसे जबाब दिया,`मैंने आपको पैसे दिये हैं, आप मुझे टिकट दीजिए। मैं बिना टिकट यात्रा नहीं करता।´ यह सुनकर वह आग-बबूला हो गया और मेरे पैसे वापस करते हुए ड्राईवर को बस रोकने को कहा तथा मुझे जबरन उतारने लगा। मैंने उतरने से इन्कार करते हुए कहा कि आपने वहाँ क्यों बिठाया था? अब मैं जंगल में कहाँ जाऊँगा? उसने गालियों से विभूषित करते हुए कहा, “मुझे क्या पता था कि तू गांधी का चेला है।´´
पूरी बस में एक भी सवारी की हिम्मत नहीं हुई कि उस परिचालक के उस अन्याय का विरोध कर सके। इसके विपरीत सभी लोग मुझे ही समझाने लगे और परिचालक ने मुझे धक्का देकर नीचे उतार दिया। उस ठिठुरन भरी अन्धेरी रात में मुझे लगभग दो किलामीटर पैदल चलकर उत्तर प्रदेश व हरियाणा की सीमा पर स्थित चैक-पोस्ट पर पहुँचना पड़ा, जहाँ से दूसरी बस मिली।

संपूर्ण स्त्री जाति के लिए कृतज्ञता से उसका सर झुक गया

प्रेरणा

उसकी नियुक्ति उसके घर से लगभग 800 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी क्षेत्र में हो गई थी। इतनी दूर जाने की इच्छा उसकी नहीं थी। घरवाले भी उसे जाने की अनुमति नहीं दे रहे थे, किन्तु उसके अन्तर में छुपी घुमक्कड़ी प्रवृत्ति ने उसे जाने के लिए प्रात्साहित किया तो रोजगार की मजबूरी ने उसे जाने के लिए मजबूर किया। वह येन-केन प्रकारेण घरवालों की अनुमति लेकर उस पहाड़ी विद्यालय में पहुँच गया।
विद्यालय में कार्यभार तो उसने ग्रहण कर लिया किन्तु उसका मन वहाँ नहीं लगा। जीवन में पहली बार इतनी दूर पहाड़ी क्षेत्र में अकेला आया था। अत: घबराहट होने लगी और एक सप्ताह बाद ही वहाँ से चलने की योजना बनाने लगा। इसी योजना के तहत वह एक दिन अपना सूटकेश उठाकर घर की ओर चल पड़ा। रास्ते में एक स्टेशन पर बैठा रेलगाड़ी की प्रतीक्षा कर रहा था कि उसे तभी स्मरण हो आया कि जिस विद्यालय में उसका मन नहीं लग रहा है व घर से दूर होने के कारण भाग रहा है, उसी विद्यालय में सुदूर दक्षिणी राज्य केरल की एक लड़की टी.जी.टी. हिन्दी के पद पर कार्यरत है और भारत के दक्षिणी कौने से उत्तरी कौने तक की यात्रा भी अकेली ही करती है। वह सोच में पड़ गया कि उसका कार्यक्षेत्र से इस तरह भागना कहाँ तक उचित है? संपूर्ण भारत को माँ मानना क्या केवल दिखावा है? `वसुधैव कुटुंबकम्´ की बात करने वाला अपने ही देश में कार्यक्षेत्र से भाग रहा है? क्या उसका ‚दय इतना कमजोर है? उसने पुन: विद्यालय लौटने का निर्णय लिया और वापस चल पड़ा।
वापसी की यात्रा में मन ही मन उस अज्ञात लड़की को धन्यवाद दे रहा था जिसको उसने अभी देखा भी न था और जो उसकी प्रेरणा का आधार बनी। वह सोच रहा था कि आज उसे फिर एक बार स्त्री जाति से ही प्रेरणा मिली। संपूर्ण स्त्री जाति के लिए कृतज्ञता से उसका सर झुक गया।

चारों पुत्र फूट-फूटकर रोने लगे

फूट और एकता

रामलाल नाम का एक जमींदार था। उसके चार बेटे थे। बड़े का नाम कमलदेव, उससे छोटे का नाम रमेश, उससे छोटे का नाम हरेश तथा सबसे छोटे का नाम दुर्गादत्त था। वे तीनों अपने पिताजी को तो बहुत प्यार करते थे किन्तु आपस में एक दूसरे से लड़ते झगड़ते एंव ईर्ष्या रखते थे।
एक दिन किसी बात पर उनकी उनके पड़ोसी दयाराम से लड़ाई हो गई। दयाराम अकेला था, इसलिये डरकर चुप रहा।आखिर दयाराम था तो उनका पड़ोसी ही, उसे पता चल गया कि ये चारों भाई एक दूसरे का ख्याल नहीं रखते तथा आपस में बहुत ईश्र्या करते हैं।उसने चारों से अपने अपमान का बदला लेने का निश्चय किया। एक दिन वे चारों लड़के कहीं जा रहे थे। पड़ोसी दयाराम कमलदेव को पकड़कर पीटने लगा। रमेश, हरेश और दुगाZदत्त ने कोई सहायता नहीं की। क्योंकि वह आपस में ईश्र्या करते थे।दयाराम अपनी सफलता पर या कहना चाहिए उनकी मूर्खता पर बहुत प्रसन्न हुआ। दूसरे दिन दयाराम ने रमेश की पिटाई की तथा तीसरे व चौथे दिन हरेश व दुगाZदत्त की। जमींदार के चारों लड़कों को दयाराम पीट चुका था।चारों ही अपनी पिटाई से दुखी थे।
एक दिन दयाराम ने रामलाल जमींदार को पकड़ा । जमींदार से उसके चारों पुत्र प्यार करते थे। वे लाठी ले- लेकर आ गये और दयाराम की ऐसी पिटायी की कि उसे अपनी नानी याद आ गयी। घर पहुँचने पर जमींदार रामलाल ने चारों लड़को को अपने पास बिठाया और कहा तुम चारों ने आज रामलाल से मुझे बचाया यदि जरा सी भी देर हो जाती तो दयाराम मुझे नहीं छोड़ता।दयाराम बहुत दुश्ट प्रकृति का आदमी है उससे सावधान रहना।इसी तरह एकता बनाये रखना,बेटा एकता में बड़ी शक्ति है।यदि तुम एक रहोगो एक दूसरे की सहायता व संरक्षा करोगे तो दयाराम तो क्या गॉव में किसमें हिम्मत है जो तुम्हारी ओर आँख उठाकर भी देख सके।
यह सुनकर रामलाल के चारों पुत्र फूट-फूटकर रोने लगे और अपनी पिटायी का सही-सही हाल पिता को बताया और संकल्प लिया कि अब हम कभी आपस में ईर्ष्या नहीं करेगें।

सबसे महान है मेरा देश

मेरा देश

बेचारे विक्रम की माँ की मृत्यु बचपन में ही हो गयी थी। पिता थे जिन्होंने ही विक्रम को पाला अथाह प्यार दिया। पिता के प्यार के आगे विक्रम को माता की कमी बिल्कुल न अखरी। वह स्कूल में पढ़ने जाने लगा था। पढ़ने में बड़ा तेज था। कक्षा में उसका प्रथम स्थान आता था किन्तु उसे यह पढ़ाई बिल्कुल अच्छी न लगती। वह विदेशी प्रिन्सीपल से चिढ़ता था। पिता भी सन्तुश्ट नहीं थे वह चाहते थे कि मेरा बेटा कब बढ़ा हो और मैं इसे अपने हाथों से तैयार कर स्वतन्त्रता संग्राम के लिये भेजूँ।
विक्रम अठारह वशZ का हो गया था। एक पड़ोस की लड़की आशा से प्यार करने लगा था। आशा ही तो विक्रम के जीवन की आशा थी। आशा के पिता ने आशा की मँगनी विक्रम के साथ तय कर दी थी। एक रात पिता को अचानक अपनी पुरानी योजना याद आयी। उन दिनों स्वतन्त्रता संग्राम जोरों पर था। नौजवानों के लिये आहवान था देश के लिये बलिदान होने का। पिता ने विक्रम को अपने पास बिठाया तथा विक्रम से अपनी इच्छा व्यक्त की। विक्रम को आजकल लड़ाई से डर लगता था। वह अपनी प्रेमिका से असीमित प्रेम करता था। अत: वह स्वतन्त्रता संग्राम के लिये राजी न हुआ।
जब वह आशा से मिला व पिता द्वारा कही गयी बात बतायी तो यह जानकर आशा बड़ी दुखी हुई कि स्वाधीनता संग्राम के लिये इसने मना कर दिया है। आशा ने उससे आग्रह करके स्वाधीनता संग्राम में जाने की हामी भरवा ली। शांय को जब विक्रम ने अपने पिता से स्वतन्त्रता संग्राम में जाने की बात कही। उसके पिता बड़े प्रसन्न हुए तथा दूसरे दिन अश्रुपूरित नेत्रों से उन्होंने विदा किया। उस समय आशा भी आयी और आरती उतार कर कहा, “मेरे विक्रम सदैव ध्यान रखो सबसे महान है मेरा देश !

शिक्षा-दहेज-बेरोजगारी

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इस छोकरी को देख जो सरस्वती बनी बैठी है

मानसिकता

रामपुर एक छोटा सा कस्बा था। यहाँ प्रतिवर्ष रामलीला होती थी। रामलीला का प्रारम्भ गणेश जी की सवारी निकाल कर ही किया जाता था। इस वर्ष लोगों में अपूर्व उत्साह था। सवारी में कई झाँकियां निकाली जा रहीं थी। सबसे पहले गणेश जी की झाँकी थी, उसके बाद राम लक्ष्मण जानकी सरस्वती माँ एवं अन्य की झाँकियां थीं। सभी दुकानदार दुकानों से बाहर निकल आये थे शोभा यात्रा देखने। स्त्रियाँ भी अपनी-2 छतों पर खड़ी शोभा यात्रा निहार रहीं थी। एक तरफ कुछ तरूण विद्यार्थी खड़े-खड़े शोभा यात्रा देख रहे थे। एक विद्यार्थी ने दूसरे से कहा- देख यार राम-लक्ष्मण की जोड़ी कितनी सुन्दर लग रही है। दूसरे ने कहा- क्या देखता है यार, इस छोकरी को देख जो सरस्वती बनी बैठी है।

दी हुई सीख गाँठ बॉध ली

सीख

वह कक्षा 6 में पढ़ता था। आवासीय विद्यालय होने के कारण छात्रावास में रहना पड़ता था। परिवेश का प्रभाव, वह एक दिन छात्रावास व कक्षाध्यापक की नजरें बचाकर फिल्म देखने शहर चला गया। शांयकालीन उपस्थिति के समय न मिलने पर वार्डन द्वारा खोज-बीन की गयी। वह अपने साथियों सहित रंगे हाथों फिल्म देखते हुए पकड़ा गया। वार्डन ने सभी को रंगे हाथों पकड़ लिया। कार्यवाही हुई, घर भेज दिया गया।
एक सप्ताह बाद जब वापस छात्रावास में आये तो वरिष्ठ छात्रों ने लताड़ा, फटकारा, “अभी तुम कच्चे खिलाड़ी हो। हमसे कुछ सीखो। हम जो भी कहते हैं, तुम्हारे हित में कहते हैं। हमारी मानोगे तो फायदे में रहोगे। फिल्म देखने जाना था तो हमसे पूछकर जाते। हम फिल्म देखते हैं, सिगरेट पीते हैं, कभी-कभी शराब भी पी लेते हैं किन्तु आज तक पकड़े नहीं गये। जब भी फिल्म देखनी हो रात्रि में 9 से 12 का शो देखो।´´
वह बड़े भैया की बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था। दी हुई सीख गाँठ बॉध ली.


आज उसका पुरूषत्व जाग उठा

पुरूषत्व बनाम दहेज

राकेश अपने फ्लेट की घण्टी बजाना ही चाह रहा था कि अन्दर की फुसफुसाहट सुनकर रूक गया। खिड़की के पास जाकर ध्यान से सुनने लगा। अपरिचित स्वर `डार्लिग मेरा तो दिल धड़क रहा है, कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन कोई देख ले और तुम्हारे पति से कह दे। ऐसे प्रतिदिन मेरा आना ठीक नहीं है।´
`मैं कितनी बार कह चुकी हूँ विजय। राकेश बेचारा बड़ा सीधा है। उसको इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उसका पुरूषत्व मेरे पिता द्वारा दिये गये दहेज से दब गया है । कहने की तो क्या वह स्वयं देख भी ले तो भी न बोले।´ मंजू ने लापरवाही के साथ जबाब दिया।
राकेश के लिये और सुन पाना सम्भव नहीं था उसके हाथ स्वत: ही घन्टी पर पड़ गये, आज उसका पुरूषत्व जाग उठा।

अब तो कभी नहीं छुपोगे ?

अदालत

अदालत कोर्ट कचहरी आदि से कौन परिचित न होगा ? किन्तु वकीलों, न्यायाधीशों व अदालती कर्मचारियों को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो अदालत जाना पसन्द करे। अदालत विभिन्न प्रकार की होतीं हैं- तहसील की अदालत, जिला अदालत से लेकर उच्चतम न्यायालय तक अदालतों की एक बहुत बड़ी श्रंृखला पाई जाती है। इनके अतिरिक्त आजकल अन्य वििशश्ट अदालतों का गठन भी होने लगा है, जैसे-उपभोक्ता अदालत,पारिवारिक अदालत तथा इसी तरह की अन्य अनेक विशिष्ट अदालतें। किन्तु मेरा इन अदालतों से कोई प्रयोजन नहीं, मैं उस अदालत की बात कर रहा हूँ जिसमें किसी वकील या पेशकार की आवश्यकता नहीं पड़ती।
जी,हाँ! मैं उस अदालत की बात कर रहा हूँ जिसमें बिना बहस के सत्य की परतें उघड़ती चली जाती हैं। जिसमें किसी गवाह की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिसकी कार्यवाही के लिए किसी प्रक्रिया व निर्धारित कार्यक्रम की आवश्यकता नहीं पड़ती।जहाँ अभियुक्त की भूमिका में भी मैं ही हुआ करता था तो अपराध को स्वीकार कर गवाह-सबूत का कार्य भी मैं ही पूरा कर दिया करता था। वकील या सिफारिशी की भूमिका आवश्यक होने पर मेरी माताजी पूरी करती थीं। उस अदालत में कभी किसी भी प्रकार की सजा नहीं दी जाती,क्षमा करके गोदी में ले लेना ही वहाँ का अन्तिम निर्णय होता था, होता था क्यों ? होता है। आप बता सकते हैं ? मैं किस अदालत की बात कर रहा हूँ ।
जी ,हाँ!आप सही पहुँचे। मैं पिताजी की अदालत की ही बात कर रहा हूँ। बचपन में, पिताजी की अदालत में, एक बार मेरी पेशी हुई। पिताजी की अदालत से मुझे इतना डर लगता था कि अगर मैं कोई अपराध कर बैठता और माताजी पिताजी के पास ले जातीं तो उनसे निवेदन करता आप कितना भी दण्ड दें लें किन्तु पिताजी के पास न ले जाये। एक बार की घटना तो मुझे अभी तक ऐसी याद है जैसे, पिताजी सामने खड़े हैं और मैं अपराधी जमीन में गढ़ा जा रहा हूँ।
एक दिन सुबह-सुबह मैं कॉलेज जाने के लिये घर से निकला, पर कॉलेज नहीं गया क्योंकि विज्ञान के गुरुजी ने जो काम दिया था, उसे मैं पूरा नहीं कर पाया था। विज्ञान के गुरुजी बड़े तेज मिजाज के थे। उनके द्वारा लगाई जाने वाली पिटाई से कक्षा के सभी छात्र घबड़ाते थे। मेरा भोजन किसी न किसी माध्यम से कॉलेज भेज दिया जाता था। मैं कालेज तो गया ही नहीं था तथा यह डर भी बना हुआ था कि भोजन के समय मेरा कॉलेज में न मिलना पिताजी को पता चल गया तो क्या हालात होगी ? मेरे गाँव से कालेज लगभग दो किलोमीटर दूर थी। बीच में एक बम्बा (नाला) पड़ता था। नाले पर से जो मुख्य रास्ता था वहीं पर मूँज में छिपकर मैं बैठ गया और भोजन लाने वाले की प्रतीक्षा करने लगा।
काफी दूर से ही मैंने भोजन लाने वाले को देख लिया। अब समस्या थी कि इनसे भोजन लेने सामने कैसे जाँऊ? ठीक समय पर मस्तिष्क ने काम किया, मैंने बस्ते को वहीं छिपाया, चुपके से निकल दौड़ता हुआ अपने घर की ओर चलने लगा। रास्ते में भोजन लाते हुए भोजन लाने वाले को तो मिलना ही था, वे बोले यहाँ क्यों आय? उत्तर दिया भाई जी भूख लग रही थी सोचा घर पर जाकर ही भोजन कर आऊँ और टिफिन लेकर उन्हें लौटाकर वापस अपने छुपे हुये स्थान पर आया तथा भोजन कर बैठा रहा । छुट्टी की घण्टी सुनकर घर पहुँचा।
दुर्भाग्य से मेरी करतूतों का पता घर पर लग चुका था। कोई सज्जन मुझे छिपा हुआ देख आये थे और उन्होंने हमारे घर सबकुछ बता दिया था। मैं घर पहुँचा ही था कि माताजी के द्वारा मुझे पिताजी के पास जाने का निर्देश मिला। मुझे पता नहीं था,फिर भी चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत। मैं डरता-डरता पिताजी के पास पहुँचा। पिताजी ने बड़ी ही शान्ति से पूछा कहाँ से आ रहे हो? मैंने जबाब दिया, `कॉलेज` से। इसके बाद पिताजी ने आदेश दिया- कॉलेज में क्या-क्या पढ़ाया? बस्ता लाकर हमें दिखाओ। मैं जीवन की एक कठिन समस्या से जूझ रहा था। मुँह से अपने आप निकल पड़ा, कालेज में आज कोई भी पीरियेड नहीं लगा।
मुझे यह नहीं पता था कि मैं काँप भी रहा हूँ। पिताजी की आँखे गुस्से से लाल हो रहीं थी। मेरे एक तमाचा लगाते हुए बोले सच-सच बताओ। अब मेरा धैर्य टूट चुका था मैंने रोते-रोते सबकुछ बता दिया।
अदालत बन्द हो चुकी थी। मैं पाँच दिन तक बहुत परेशान रहा क्योंकि पिताजी ने मुझसे बोलना बन्द कर दिया था। यह मेरे लिये सबसे बड़ी सजा थी। अब मुझे प्रतीक्षा थी पिताजी के सामने जाने की। आखिर छठवें दिन उन्होंने मुझे बुलाया और पूछा- अब तो कभी नहीं छुपोगे ? मैंने कहा अब कभी नहीं !